(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.206. अध्यायः 206
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
बृहदश्वेनोदङ्कंप्रति स्वपुत्रेण कुवलाश्वेन धुन्धुवधस्य भावित्वकथनपूर्वकं वनंप्रति गमनम् ॥ 1 ॥ धुन्धूत्पत्तिं पृष्टेन मार्कण्डेयेन युधिष्ठिरंप्रति तदुपोद्धाततया मधुकैटभवृत्तान्तकथनम् ॥ 2 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

मार्कण्डेय उवाच। 3-206-0x(2462)(24023)
स एवमुक्तो राजर्षिरुदङ्केनापराजितः।
उदङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिथाब्रवीत् ॥ 3-206-1(24024)
न हि मे गमनं ब्रह्मन्मोघमेतद्भविष्यति।
पुत्रो ममायं भगवन्कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ 3-206-2(24025)
धृतिमान्क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि।
प्रियं च ते सर्वमेतत्करिष्यति न संशयः ॥ 3-206-3(24026)
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः।
`हनिष्यति महाबाहुस्तं वै धुन्धुं महाऽसुरम्'।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन्न्यस्तशस्त्रोस्मि सांप्रतम् ॥ 3-206-4(24027)
तथाऽस्त्विति च तेनोक्तो मुनिनाऽमिततेजसा।
स तमादिश्य तनयमुदङ्काय महात्मने।
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ॥ 3-206-5(24028)
युधिष्ठिर उवाच। 3-206-6x(2463)
क एष भगवन्दैत्यो महावीर्यस्तपोधन।
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ 3-206-6(24029)
एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन।
`यस्य निश्वासवातेन कम्पते भूः सपर्वता' ॥ 3-206-7(24030)
एतदिच्छामि भगवन्याथातथ्येन वेदितुम्।
सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ॥ 3-206-8(24031)
मार्कण्डेय उवाच। 3-206-9x(2464)
शृणु राजननिदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप।
कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ॥ 3-206-9(24032)
एकार्णवे निरालोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।
प्रनष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ 3-206-10(24033)
प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम्।
यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम्।
`चतुर्भुजमुदाराङ्गं दृष्टवानस्मि भारत' ॥ 3-206-11(24034)
सुष्वाप भगवान्विष्णुरप्शय्यामेक एव हि।
नागस् भोगे महति शेपस्यामिततेजसः ॥ 3-206-12(24035)
लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः।
नागभगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ॥ 3-206-13(24036)
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम्।
नाभ्या विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ॥ 3-206-14(24037)
साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः।
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्वर्गश्चतुर्मुखः ॥ 3-206-15(24038)
स्वप्रभावाद्दुराधर्षो महाबलपराक्रमः।
कस्यचित्त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ 3-206-16(24039)
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम्।
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ 3-206-17(24040)
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ 3-206-18(24041)
दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुपा तथा।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ 3-206-19(24042)
विस्मय सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तदा ॥ 3-206-20(24043)
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम्।
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ॥ 3-206-21(24044)
वित्रास्यमानो बहुधा ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः।
अकम्पयत्पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ॥ 3-206-22(24045)
अथापश्त गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ 3-206-23(24046)
दृष्ट्वा तावब्रवीद्देवः स्वागतं वां महाबलौ।
ददामि वां वरं श्रेष्ठं रप्रीतिर्हि मम जायते ॥ 3-206-24(24047)
तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ।
प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ॥ 3-206-25(24048)
आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम।
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद्ब्रवीह्यविचारयन् ॥ 3-206-26(24049)
भगवानुवाच। 3-206-27x(2465)
प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम।
युवां हि वीर्यसंपन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ॥ 3-206-27(24050)
वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ॥ 3-206-28(24051)
मधुकैटभावूचतुः। 3-206-29x(2466)
अनृतंनोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ॥ 3-206-29(24052)
बले रूपे च शौर्ये च शमे न च समोस्ति नौ।
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्वदमेषु च ॥ 3-206-30(24053)
उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव।
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ 3-206-31(24054)
आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो।
आनावृतेऽवकाशे त्वं जह्यावां सुरसत्तम ॥ 3-206-32(24055)
पुत्रत्वमधिगच्छाव तव चापि सुलोचन।
वर एष वृतोदेव तद्विद्धि सुरसत्तम ॥ 3-206-33(24056)
अनृतं मा भवेद्देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा ॥ 3-206-34(24057)
भगवानुवाच। 3-206-35x(2467)
बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद्भविष्यति ॥ 3-206-35(24058)
सविचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद्यदनावृतम्।
अवकाशंपृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥ 3-206-36(24059)
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा।
मधुकैटभयो राजञ्शिरसी मधुसूदनः।
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥ 3-206-37(24060)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 206 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-206-9 न तेऽभिगमनं इति झ. पाठः ॥


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